लंदन /पेरिस
यूरोप इस समय रिकॉर्डतोड़ हीटवेव की चपेट में है. फ्रांस, जर्मनी, इटली, ब्रिटेन और कई अन्य देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है. भीषण गर्मी का असर अब सिर्फ लोगों की सेहत तक सीमित नहीं है, बल्कि सड़कों, रेल नेटवर्क और बिजली व्यवस्था पर भी साफ दिखाई देने लगा है।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे कई वीडियो में फ्रांस की सड़कों की ऊपरी परत भीषण गर्मी के कारण नरम पड़ती और पिघलती नजर आ रही है. वहीं जर्मनी में अत्यधिक तापमान की वजह से ट्राम की पटरियां टेढ़ी हो गईं, जिसके कारण कई जगह सेवाएं रोकनी पड़ीं या उनकी रफ्तार कम करनी पड़ी।
रॉयटर्स के मुताबिक, यह हीटवेव 20 जून के आसपास शुरू हुई और कुछ इलाकों में सामान्य से 18 डिग्री सेल्सियस तक अधिक तापमान दर्ज किया गया. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह स्थिति 'ओमेगा ब्लॉक' नाम के मौसमीय पैटर्न और जलवायु परिवर्तन के संयुक्त असर का परिणाम है. सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो वायरल हो रहे हैं, जो यूरोप में गर्मी की भयावह स्थिति को दिखाते हैं।
भारतीयों से ज्यादा यूरोपीय लोगों को क्यों सताता है?
जब यूरोप में तापमान 40 डिग्री पहुंचता है तो लोग कहते हैं कि जीवन रुक गया है. अस्पताल भर जाते हैं. मौतें बढ़ जाती हैं. वहीं भारत में कई इलाकों में 40-45 डिग्री आम बात है, लोग काम करते रहते हैं. यह फर्क सिर्फ तापमान का नहीं, बल्कि कई अन्य कारणों की वजह से है. आइए समझते हैं दोनों में अंतर...
नमी का असर – सबसे बड़ा अंतर
सबसे महत्वपूर्ण अंतर ह्यूमिडिटी (नमी) का है. भारत में गर्मी के मौसम में नमी बहुत ज्यादा होती है, लेकिन लोग इससे अभ्यस्त हैं. यूरोप में जब 40 डिग्री आता है तो अक्सर सूखी गर्मी होती है, लेकिन कई बार नमी भी बढ़ जाती है. जब नमी ज्यादा होती है तो पसीना सूखता नहीं है. शरीर का तापमान नियंत्रित नहीं हो पाता. इसे वेट बुल्ब टेम्परेचर कहते हैं. यूरोप में 40 डिग्री के साथ अगर नमी 60-70% हो जाए तो इंसान के लिए खतरनाक हो जाता है. भारत में लोग लंबे समय से गर्मी झेल रहे हैं, इसलिए उनका शरीर बेहतर तरीके से ढल जाता है।
ऐसा ही एक वीडियो सामने आया है, जिसमें एयर कंडीशनर (AC) खरीदने के लिए लोगों की लंबी कतारें दिखाई दे रही हैं. दुकान के बाहर इतनी भीड़ है कि मानो खरीदारी नहीं, बल्कि होड़ मची हो। वहीं एक अन्य वीडियो में भीषण गर्मी के कारण सड़क का डामर नरम पड़ता और पिघलता नजर आ रहा है।
एक और वीडियो में यूरोप के समुद्र तटों (बीच) पर लोगों की भारी भीड़ दिखाई दे रही है. गर्मी से राहत पाने के लिए हजारों लोग समुद्र किनारे पहुंच गए, जिससे वहां मेले जैसा माहौल बन गया। फ्रांस में गर्मी के कारण अस्पतालों पर दबाव बढ़ गया है. कई इलाकों में बिजली आपूर्ति प्रभावित हुई, जबकि गर्म नदियों के कारण कुछ परमाणु बिजली संयंत्रों का उत्पादन भी घटाना पड़ा. इटली, जर्मनी और मध्य यूरोप के कई हिस्सों में भी रेड अलर्ट जारी किया गया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि यूरोप में कभी 'सदी में एक बार' आने वाली ऐसी भीषण हीटवेव अब जलवायु परिवर्तन की वजह से कहीं ज्यादा बार देखने को मिल सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में ऐसी घटनाएं और गंभीर हो सकती हैं.
इमारतें और घर कैसे बने हैं?
यूरोप की इमारतें ठंड के लिए बनाई गई हैं. दीवारें मोटी, इंसुलेशन अच्छा पर गर्मी निकालने की व्यवस्था कम. जब 40 डिग्री की गर्मी पड़ती है तो घर के अंदर भी तापमान बहुत बढ़ जाता है. वहां एयर कंडीशनर कम घरों में हैं।
भारत में घरों में छतें ऊंची, खिड़कियां बड़ी, पंखे, कूलर और एसी का इस्तेमाल आम है. लोग दोपहर में आराम करते हैं. शाम को काम करते हैं. यूरोप में ऐसी आदत नहीं है. स्कूल, ऑफिस और अस्पताल भी गर्मी के लिए तैयार नहीं होते।
सूर्य की तीव्रता
यूरोप हाई एल्टीट्यूड पर स्थित है, इसलिए वहां गर्मियों में दिन बहुत लंबे (15 से 17 घंटे) हो जाते हैं. साफ आसमान और कम वायु प्रदूषण के कारण सीधी धूप बहुत तेज और चुभने वाली लगती है।
रात का तापमान और आराम
यूरोप की हीटवेव में रात का तापमान भी बहुत ऊंचा रहता है. शरीर को ठंडा होने का मौका नहीं मिलता. लगातार गर्मी से थकान, दिल का दौरा और मौतें बढ़ जाती हैं. भारत में दिन में गर्मी ज्यादा होती है लेकिन रात में तापमान काफी गिर जाता है. इससे शरीर को राहत मिलती है. यही वजह है कि भारत में 40 डिग्री सहन करना यूरोप की तुलना में आसान पड़ता है।
लोगों की आदत और स्वास्थ्य
भारतीय शरीर गर्मी के लिए ज्यादा तैयार रहता है. बचपन से गर्मी में खेलना, काम करना सिखाया जाता है. पसीना आना, ज्यादा पानी पीना, छाछ-निम्बू पानी जैसी चीजें आम हैं।
यूरोप में ज्यादातर लोग ठंडे मौसम में रहते हैं. उनकी त्वचा पतली, शरीर गर्मी सहने के लिए कम तैयार होता है. खासकर बुजुर्ग और बच्चे जल्दी प्रभावित होते हैं. फ्रांस, जर्मनी, इटली जैसी जगहों पर 40 डिग्री में हजारों अतिरिक्त मौतें हो जाती हैं।
तैयारियां और सरकारी व्यवस्था
भारत में हीटवेव एक्शन प्लान है. स्कूलों की छुट्टी, पानी की व्यवस्था, जागरूकता अभियान चलते हैं. लोग जानते हैं कि दोपहर 12 से 4 बजे तक बाहर कम निकलना चाहिए।
यूरोप में अचानक गर्मी आने पर सरकारें भी हैरान रह जाती हैं. अस्पताल तैयार नहीं होते, बिजली की मांग बढ़ने से ग्रिड फेल हो जाते हैं. ट्रेनें रुक जाती हैं, सड़कें पिघल जाती हैं।
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
वैज्ञानिक कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन यूरोप को तेजी से गर्म कर रहा है. पहले वहां 40 डिग्री बहुत दुर्लभ था, अब लगभग हर साल हो रहा है. यूरोप अब भी अनुकूलन (Adaptation) की प्रक्रिया में है
भारत गर्म देश है, इसलिए 40-45 डिग्री नया नहीं. लेकिन भारत को भी चिंता करनी चाहिए क्योंकि गर्मी और बढ़ रही है. दिल्ली, राजस्थान में 48-50 डिग्री भी पहुंच रहा है।
क्या सीख सकते हैं दोनों देश?
यूरोप को भारत से सीखना चाहिए- हल्के कपड़े, दिन की आदतें बदलना, पानी की व्यवस्था और सस्ते कूलिंग सिस्टम.
भारत को यूरोप से सीखना चाहिए- बेहतर मौसम पूर्वानुमान, हेल्थ अलर्ट सिस्टम और लंबे समय का प्लानिंग.
दोनों को गर्मी से निपटने के लिए हरे-भरे शहर, अच्छी इमारतें और जागरूकता बढ़ानी होगी।
40 डिग्री तापमान हर जगह एक समान नहीं होता. यूरोप में यह आपातकाल जैसा है क्योंकि वहां की जलवायु, इमारतें, आदतें और तैयारियां ठंड के हिसाब से हैं. भारत में यह चुनौती है लेकिन सहनशक्ति ज्यादा है. जलवायु परिवर्तन के युग में दोनों देशों को अपनी रणनीति बदलनी होगी. गर्मी अब सामान्य हो रही है. इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. सही तैयारियों से हम इस चुनौती से निपट सकते हैं और जानें बचा सकते हैं।
Source : Agency
